Tuesday, 18 May 2010

आधी आधी है ज़िन्दगी ...

आधी आधी है ज़िन्दगी ...
आधी आधी है मेरी कहानी ...
आधी है धुप ,आधी है छाँव...
आधी आधी है मेरी बात
आधी आधी है तेरी बात ...
आधा आधा है तेरा रूप ...
आधे आधे हैं मेरे कदम...


आधा आधा है मेरा प्यार ...
आधी आधी है रात
आधी आधी है मेरी रूह ...
आधी आधी है ज़िन्दगी...

इस आधी आधी सी ज़िन्दगी में
कोशिश है बस कुछ हो जाये पूरा
बस तू और मैं और हो जाये ये ज़िन्दगी पूरी...

Thursday, 11 February 2010

अलग

दुनिया में सब से अलग होना
या कहूँ की दुनिया से थोडा सा भी अलग चलना
इस दुनिया के लोगों को अजीब लगता है
लगता है की ये तो हमारी बनाई इन रस्मों को चकना चूर कर देगा
अगर आप बदलने की कोशिश करते हैं तो
उल्टा आप पर ही हमले हो जाते हैं
ऐसे नहीं वैसे नहीं
ऐसा क्यूँ वैसा क्यूँ
ऐसे मत करो ये मत करो
ऐसे करोगे तो ये हो जायेगा
वैसा करोगे तो वो हो जायेगा
ऐ दुनिया वालों अपना भी दिमाग लगाने दो
इन्सान को की वो भी कहीं तुम्हारे जैसा
पुतला ना बन जाये.

Tuesday, 19 January 2010

दिन के अँधेरे में


दिन के अँधेरे में
रात के उजाले में
चाँद के उजाले में
सूरज के चांदने में
मैं लटका हुआ हूँ पेड़ के ऊपर
इन उनींदी आँखों में
सब लगता है
उल्टा पुल्टा
आँखे बंद करने से लगता है
डर लगता हैं
कहीं ये दुनिया
बदल ना ले
अपने रंग .


Saturday, 16 January 2010

तन्हा तन्हा है सफ़र


तन्हा तन्हा है सफ़र
नज़र ना आता है यहाँ कोई हमसफ़र
एक ज़िन्दगी में आते लोग कईं हज़ार
उनमे से भी ना मिले कोई हमसफ़र
तन्हा तन्हा और होता जा रहा ये सफ़र

Wednesday, 6 January 2010

तू ख़ुदा है


इश्क में ख़ुदा मिल गया
ख़ुदा में तू मिल गया
और कुछ ना चाहे ये दिल
मुझे तो बस तू चाहिए
तू ना मिला तो
ना हूँ मैं इस दुनिया में
मैं तो हूँ सूफी तेरे प्यार में
तू इश्क है
तू ख़ुदा है



Wednesday, 30 December 2009

साल दर साल ये ही है कहानी



यहाँ तो लगता है की अँधेरे ने फैला दिए हैं अपने पर 
कुछ भी ना लगे सही 
क्यूंकि आम इन्सान की ना है किसी को फ़िक्र
और हो भी क्यूँ 
अरबों करोड़ों रुपए तो उन्हें मिल ही जाते हैं अपने लिए 
जुर्म कर के भी जब उन्हें है ही पता की 
बस एक इस्तीफा देकर ही चल जायेगा काम तो 
कहे को वे करें चिंता 
यहाँ तो सब बने बैठे हैं मौम के बूत
वो भी जो जुर्म करते हैं 
और वो भी जिन पर जुर्म होता है
साल दर साल ऐसे ही तो होना है 
चाहे हम कुछ भी करें 
कितना हो-हल्ला मचाएं 



फिर से 365 दिन बाद एक साल और चला जायेगा 
पर फिर भी कोई कुछ नहीं करेगा 
दिन महीने साल तो ऐसे ही चले जातें रहेंगे
हम उसके जाने के आंसू 
और आने का नशा करते रहेंगे
पर कुछ ऐसा ना करेंगे जिस से हमे ख़ुशी मिले 
हमारी धरती फले फुले ...
साल दर साल ये ही है कहानी 
इन्सान ने बना दी धरती 
एक अधूरी कहानी ...

Tuesday, 29 December 2009

आपका क्या ख्याल है?



याद नहीं इस साल में कुछ ख़ास किया होगा
बस बीत गया चुपके से, पता न चला
नये की तयारी है
पर देश में फैली बीमारी है
बीमारी महंगाई की
बीमारी भ्रष्टाचार की
घोटालों की,
अन्याय की
नए साल में यही बैलेंस ले के जा रहे हैं
क्या, आपको ऐसा नही लगता?
मुझे तो कोई और बैलेंस नज़र नही आता
आपका क्या ख्याल है?
बस इतना सा सवाल है
.................................................................
मलखान सिंह द्वारा दफ़ा-512(dafaa512.blogspot.com) के लिए

अच्छा है तुम इस दुनिया में नहीं हो

पिछले दिनों मुझे एक केस के सिलसिले में घर जाना पड़ा.ये केस में फ़ोन का था जो की आज से ६ महीने पहले छीना गया था ,और उसकी पहली सुनवाई ६ महीने के बाद हो रही थी .उस दिन अदालत में काफी देर इंतजार करना पड़ा तो मैं सोच रहा था की हमारी न्यायिक व्यवस्था कितनी ढीली ढाली है .की एक छोटे से केस में ही कितना समय लग रहा है.
            पर जो मैं सोच रहा था वो शायद बहुत ही गलत सोच रहा था ,उसी दौरान रुचिका केस में राठौर को सजा मिली ,सजा भी क्या मिली सिर्फ ६ महीने. एक लड़की की जान के लिए ६ महीने की सजा और सजा मिलने के १० मिनट बाद ही जमानत .और भी जितने पहलु मैंने इस केस में अभी तक देखे सुने हैं ,उन से तो लगता है की मैं तो सिर्फ ६ महीने से ही परेशान हुआ   और  रुचिका के घरवाले  जो 19 साल  से केस लड़  रहे  थे  .एक दबंग  अफसर के डर में अब तक जी रहे थे उन पर क्या गुजरी  होगी .इसका हिसाब लगाना ना मेरे बस में है ना ही किसी और के.रुचिका ने तो अपनी ज़िन्दगी को खत्म ही कर लिया था ,पर उसके भाई आशु पर तो जो भी बिता वो हमारी व्यवस्था का चेहरा सा नज़र आता है .की हम किस समाज में जीतें हैं .ऐसी चीज़ें हमने फिल्मों में बहुत देखी हैं .पर इतना भयानक वर्णन शायद ही सुना हो. 
             राठौर जो की एक राक्षस की तरह हस्ते हुए अदालत से निकला था ,ने ना केवल अपने विभाग  बल्कि नेताओं तक पर इतना असर किया की उस पर कहीं से भी आंच नहीं आई.वो पदोनती पर पदोनती लेता रहा ,और गिरोह्त्रा परिवार पर अपने जुल्म जरी रखे रहा .हर रोज अब कोई ना कोई नेता ,या फिर पुलिस विभाग से नए नए खुलासे हो रहे पर शायद राठौर तो आराम से अपने घर बैठ कर ये तमासा देख रहा होगा.
             एक बात और की वैसे तो रुचिका ने ज़िन्दगी से हार मान कर आत्महत्या तो की ,लेकिन रुचिका ने शायद सही ही किया .इस ६ महीने की सजा के ढोंग को देख कर वो कर भी क्या पाती ,एक और ज़िन्दगी जीते जी मर जाती .अच्छा है रुचिका आज जिंदा नहीं है ,नहीं तो उसका मन राठौर,तिवारी और उन बाबाओं को देख कर रो रहा होता जो कितनी ही लड़कियों को अपनी हवास का शिकार बनाते हैं और साफ़ साफ़ बच कर निकल जातें हैं .
                                                              

Wednesday, 23 December 2009

ज़िन्दगी की तलाश में ...


ज़िन्दगी की तलाश में
मैं चल तो दिया
उस दिन रुका था एक जगह
जहाँ था "वो"
जिसने बदल दी मेरी ज़िन्दगी की तलाश को
उस तलाश को तलाशते
मैं तो जान भी ना पाया
की किस दर पर मैं चला गया
ऐसा "वो" मिला था मुझे
जिस से अब जुड़ गया हूँ मैं
चाह कर भी अब "वो" ना जा पायेगा
मेरे पास से .
पर वो कहता है की तू चला जा
पर क्या अपनी रूह से अलग हो सकता हूँ मैं
बस एक सवाल है ये मेरी ज़िन्दगी का

Sunday, 13 December 2009

सुम मैं गुम सुम





सुम सुम गुम सुम मैं गुमसुम
मैं तू ,तू मैं
तुम हम हम तुम
भूला तू ,ना भूला मैं
मैं जाना ,सुम तुम से
तुम सुम से नहीं
फिर भी तू तू नहीं
तुम मैं नहीं
बस हम तो गुम तुम में
पर तुम तुम हो गुम गुम
भूल मुझे गुम हो तुम
पर सुम तो तुम में ही है
ना हो जा इतना गुम
की सुम रूम सुम गुम सुम
ना हो जाये तू गुम ...


Saturday, 21 November 2009

सब सही है


यहाँ कोई गलत नहीं है
सब का अपना सोचना है
अगर मेरे लिए कोई सही नहीं है
तो किसी के लिए मैं सही नहीं हूँ.
इस दुनिया में अपनी कमियों को छिपाने के लिए 
हम दूसरों को बुरा बना देता है.
यहाँ कोई सही नहीं है यहाँ कोई झूठा नहीं है
पर यहाँ डर है यहाँ प्यार है
यहाँ वो है जो कहीं भी नहीं है.
मैं जानता हूँ की मैं जो हूँ 
मैं हूँ.
मेरे होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता 
पर पड़ता है क्यूंकि मैं तो मैं हूँ 
मैं प्यार करता हूँ नफरत करता हूँ
भुलाने की कोशिश करता हूँ 
पर सही तो नहीं है हैं ना
की सब भूल जाऊँ.
जानता हूँ सब सही नहीं है 
पर कैसे जाने दूँ अपने प्यारे को दूर .
जानता हूँ सब सही नहीं है 
पर फिर भी कोशिश जारी है 
की सब सही हो जाये 
होगा पर जानता हूँ की कुछ तो ऐसा होगा
कोई तो होगा जो करेगा सब सही.
बस नहीं चाहता हूँ किसी से नफरत करना लेकिन 
इन्सान हूँ सब सही नहीं कर सकता.
सब सही है इस दुनिया में फिर भी ..............................

Thursday, 19 November 2009

मेरी भड़ास

इस छोटी सी दुनिया में में  बहुत से लोग मिलते हैं सच कहूँ तो टकराते हैं .मैं आज तक बहुत से लोगों से मिला हूँ ,कुछ लोग पसंद आये तो कुछ नापसंद, तो कुछ लोग ऐसे भी मिले जिनको मैं इस दुनिया का हिस्सा ही मानता .मतलब ये की वो इन्सान नहीं बल्कि किसी विक्षिप्त जगत से आये हैं .
ये लोग कहीं ना कहीं किसी ना किसी चीज़ में बहुत अच्छे होते हैं ,और उन अच्छी चीज़ों को लेकर वो ऐसे हो जाते हैं की राज ठाकरे बन जाते हैं . मैं ऐसे ही एक इन्सान से मिला जो अपने आप को कहता तो ये है की वो धर्म ,जाति,नस्ल में विश्वास नहीं रखता .विश्वास से अर्थ ये की वो भेदभाव नहीं करता .और ये सब उसकी बातों से झलकता भी है .लेकिन कहीं ना कहीं वो अपने आप को ही धोखा दे रहा होता है .
वो एक जाति को लेकर इतना ज्यादा विरोधी है की ,उसे लगता है की वो पागल हैं .वो इन्सान खुद अपनी जाति की जगह अपने राज्य की साही जाति का बताना पसंद करता है .और वो ये समझता है की हरियाणा में सिर्फ एक ही जाति बस्ती है .वो जो हरियाणा से है उसका दिमाग ही नहीं है,और ना जाने कितने आक्षेप .
मुझे तो सिर्फ उस इन्सान की बातों से एक ही सवाल कुंधता है की क्या ऐसे इन्सान हमारे समाज के लिए खतरनाक नहीं जो इन्सान को इन्सान नहीं समझते .और भी काफी कुछ है कहने को पर आगे बात कहीं ना कहीं निजी हो जाएगी .

@भड़ास 4 india

वो...




इस छोटी सी जिंदगानी में
किसी को पाना और खो देना


नादान दिल ना जानता था कुछ
अब ना धड्केगा
होश ना है ,रूठ गया है वो


अब तो भीड़ भी सूखा रेगिस्तान लगती है
बस अपने मन में ही बातें कर कर के हसना रोना है

रातों में नींद नहीं है ,दिन में वो नहीं है

बस देखती है उसको हर वक़्त 
की वो यहीं कहीं तो नहीं

पास हो कर भी वो इतना दूर है 
जानो वो कभी था ही नहीं 

पर जानता वो भी है 
  की मैं भी हूँ उसका   









Tuesday, 17 November 2009

कुछ ना बोल पाया



बोल कर भी उससे कुछ ना बोल पाया
बता कर भी उसे कुछ ना बता पाया
जान कर भी उसे ना जान पाया
छु कर भी उसे छु ना पाया
ना जाने कहाँ से आई थी वो
और ना जाने कहाँ चली गयी
और मैं बस सोचता ही रह गया  I


Monday, 16 November 2009

सपने और सच

सपने कभी कभी,
सचाइयों से भी सच से लगते हैं I
लगता है की जो सोचा है,
वो बस कुछ कदम की दुरी पर है ,
पर वो तो दूर दूर तक नज़र में नहीं है I
क्यूँ अपने आप ही ज़िन्दगी को
इतना जालदार बना लेते हैं
की
उन जालियों से निकलते निकलते
अपने आप को इतना घायल कर लेते हैं
की
कुछ बचता ही नहीं ज़िन्दगी में I